✨ भूमिका: जहाँ विद्या भारी हो जाए विद्या प्रकाश है— पर जब वही विद्या कंधों पर लाद ली जाए, तो मन झुकने लगता है। आज की कथा किसी को नीचा दिखाने के लिए नहीं, बल्कि हल्का करने के लिए है। 📖 कथा: पंडित और बाँस एक गाँव में एक प्रसिद्ध पंडित रहते थे। शास्त्र कंठस्थ थे, तर्क तेज़ था, और शिष्य दूर-दूर से आते थे। गाँव के बाहर एक बाँसों का झुरमुट था। वहाँ एक साधारण-सा बाँस हवा में हिलता रहता, और उससे मधुर-सी ध्वनि निकलती। पंडित जी ने एक दिन कहा— “यह तो खाली है, इसमें क्या रखा है?” 🌾 साधु का प्रश्न एक मौन साधु वहीं आकर बैठ गया। उसने पंडित से पूछा— “आप इतने भरे हुए हैं, फिर भी भारी क्यों हैं?” पंडित चौंके। बोले— “भरा होना तो श्रेष्ठता है!” साधु मुस्कराया, बाँस की ओर इशारा किया— “और यह खोखला होकर पूरे वन को क्यों गूँजाता है?” 🔥 पंडित का मौन पहली बार पंडित के पास उत्तर नहीं था। शास्त्र याद थे, पर रिक्तता का अनुभव नहीं। उस दिन पंडित ने कोई उपदेश नहीं दिया। वे बस बाँसों के बीच बैठे रहे। और पहली बार उनका मन कुछ हल्का हुआ। 🎶 बांसुरी का संकेत कथाओं में आता है कि कृष्ण ने विद्वानों को नहीं, बाँसुरी ...
✨ भूमिका: जो झुकता है, वही बहता है पहाड़ अडिग रहते हैं, पर नदी चलती है। वह चिल्लाकर रास्ता नहीं बनाती, वह झुककर रास्ता खोज लेती है। आज का प्रश्न प्रकृति से है— नदी झुकती क्यों है? 🌑 नदी का स्वभाव नदी कभी यह नहीं कहती— “मेरा मार्ग यही होगा।” जहाँ चट्टान आती है, वह मुड़ जाती है। जहाँ ढलान मिलती है, वह बह जाती है। नदी का लक्ष्य साबित करना नहीं, पहुँचना है। 🔥 जो कठोर है, वह टूटता है कठोरता कहती है— “मैं नहीं बदलूँगा।” पर जीवन कहता है— “जो नहीं बदलता, वह टूटता है।” नदी ने यह सत्य बहुत पहले समझ लिया था। वह झुकती है, इसलिए बचती है। वह बहती है, इसलिए पहुँचती है। 🪞 अहंकार और नदी अहंकार चट्टान जैसा होता है— सीधा, सख़्त, अडिग। दैन्यता नदी जैसी होती है— नरम, सतत, जागरूक। जहाँ अहंकार अटकता है, वहाँ नदी रास्ता बना लेती है। 🌿 कृष्ण-भाव का संकेत कथाएँ हमें याद दिलाती हैं— कृष्ण कभी ज़ोर से नहीं कहते— वे बहते हैं। उनका संदेश टकराव नहीं, संगति है। जहाँ मन झुकता है, वहीं भक्ति बहती है। 🌾 जीवन का दर्पण अपने आप से पूछिए: क्या मैं हर जगह अपनी बात मनवाना चाहता हूँ? क्या मैं मोड़ को अपमान समझ लेता हूँ...
✨ भूमिका: शोर के बिना आईना हम बोलते हैं तो दुनिया दिखती है, पर जब चुप होते हैं, तो खुद दिखते हैं। आज कोई सिद्धांत नहीं, कोई कथा नहीं— आज प्रयोग है। एक ऐसा प्रयोग जो अहंकार को लड़ाकर नहीं, उजागर करके ढीला करता है। 🌑 मौन का सही अर्थ मौन का अर्थ बोलना बंद करना नहीं। मौन का अर्थ है— 👉 खुद को साबित करना बंद करना। सफ़ाई न देना तर्क न जोड़ना जीतने की कोशिश न करना आख़िरी शब्द न कहना यह मौन कंठ का नहीं, अहंकार का है। 🔥 क्यों यह अभ्यास कठिन लगता है? क्योंकि भीतर एक आवाज़ रहती है— “अगर मैं नहीं बोला, तो लोग मुझे गलत समझ लेंगे।” यहीं अहंकार रहता है। वह चाहता है— हर क्षण अपनी पहचान बचाए रखे। मौन इस पहचान को कुछ देर के लिए आराम दे देता है। 🎶 कृष्ण का मौन कई कथाओं में कृष्ण सब जानते हुए भी चुप रहते हैं। क्यों? क्योंकि सत्य हमेशा शब्दों से नहीं, कभी-कभी उपस्थिति से उतरता है। मौन में अहंकार के लिए जगह कम होती है, और करुणा के लिए खिड़की खुलती है। 🧭 24 घंटे का नियम (स्पष्ट निर्देश) आज/कल इनमें से किसी एक दिन को चुनें: इन 24 घंटों में— अपनी उपलब्धियाँ न गिनाएँ अपनी पीड़ा का प्रदर्शन न करें “मैं...
Comments
Post a Comment